//१//
मेरो देवता—
आफैँभित्र झंकृत,
प्रिय दर्शन!
//२//
मनको भाव,
एकाकार अस्तित्व,
श्वरूप आफ्नै!
//३//
दिव्य दर्शन—
बुद्धत्त्वमा छलाङ,
प्रेम स्वयंमा!
//४//
मोक्षको लागि—
सम्बोधिको तयारी,
मृत्युकै भय!
//५//
अनन्त यात्रा…
शारीरिक विश्राम,
नयाँ गन्तव्य!
नम्रता बराल
पार्दी, पोखरा–१७


